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लोकटक झील पर चार सदस्यीय समिति

November 17, 2018

लोकटक झील पर चार सदस्यीय समिति

केंद्रीय वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा मणिपुर की लोकटक झील के संरक्षण और उसे यूनेस्को के विरासत सूची वाले स्थानों में चुने जाने के लिए प्रयासों को लेकर हाल ही में 4 नवंबर 2016 को गठित चार सदस्यीय समिति का ने बीते दिनों इस झील और उसके आसपास के क्षेत्रों का भ्रमण और स्थानीय लोगों से इससे जुड़े मसलों पर विचार विमर्श किया है। पूर्वोत्तर भारत की सबसे बड़ी ताजे पानी की इस झील के संरक्षण संबंधी चिंताओं को लेकर गठित समिति को अब तक चलाए गए संरक्षण अभियान और राज्य व केंद्र सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए वित्तीय निवेश की उपयोगिता का मूल्यांकन करने के अलावा झील को नए परिप्रेक्ष्य में संरक्षित किए जाने के लिए जरूरी नए सुझाव देने हैं। यह समिति विश्व विरासत सूची में लोकटक झील के शामिल कराए जाने के संबंध में उठाए जाने वाले जरूरी प्रक्रियात्मक और नीतिगत कदमों के बारे में भी सुझाव देगी।
फुमदी और जैवविविधता का संसार:
लोकटक झील दुनिया की अकेली ऐसी झील या वाॅटरबाॅडी है जिसमें तैरते हुए द्वीप या भूखंड़ पाए जाते हैं। मिट्टी, छोटे झाड़ियों-पेड़ पौधों और अन्य जैविक पदार्थों से मिलकर तैयार तैरने वाले इन जैविक द्वीपों की सतह मिट्टी जैसी ही होती है जिसपर जीवजंतुओं का अदभुत संसार बसता है। इन द्वीपों को फुमदी कहा जाता है। लोकटक झील में इस प्रकार की फुमदियों में से सबसे बड़े का आकार लगभग 40 वर्ग किलोमीटर तक है और इसे किबुल लामिआयो नेशनल पार्क कहा जाता है जिसमें दुर्लभ प्रजाति के हिरण (संगई) पाए जाते हैं। लोकटक झील में 425 प्रजातियों के वन्य व दुर्लभ प्रकार के जीव-जंतुओं समेत पानी में उगने वाले पौधों की 233 प्रजातियां और 100 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां मौजूद हैं।
लोकटक झील पर संकट और कारण:
फुमदियों के तैरने के कारण बदलती स्थितियों और मानवीय दखल के कारण झील पर अस्तित्व का संकट उभरने लगा है और लोकटक झील आज तीन हिस्सों में बंट गई है। उत्तरी क्षेत्र बड़ी फुमदियों वाला है जो केंद्रीय हिस्से से विलग हो चुका है। मछली पालन के लिए बनाए जाने वाले कृत्रिम फुमदियों के कारण, जिसे अथफुम्स कहा जाता है, झील के नैसर्गिक स्वभाव और अस्तित्व पर खासा असर डाला है। लोकटक जलविद्युत परियोजना के कारण इसके जलसंभरण क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) में जलाप्लावन के कारण झील के जैव विविधता पर असर पड़ा है और फुमदियों की सघनता कम और झील में सिल्ट के जमाव में बढ़ोतरी हुई है। लोकटक झील के किनारे बसने वालों की आजीविका और निर्भरता का साधन है।  फुमदियों को जनवरी से मार्च के दौरान जलाया जाता है ताकि मछली पालन और धान की पैदावार के लिए जगह तैयार की जा सके।
नार्थ ईस्ट सेंटर फाॅर इंवायरमेंट एजुकेशन एंड रिसर्च, इंफाल समेत अनेक संस्थाओं ने इस झील के संरक्षण के लिए वैश्विक अभियान चलाया है। लोकटक झील को वर्ष 1990 में रामसर कन्वेंशन के तहत 463वें स्थल के रूप में जैविक विविधता को लेकर संवेदनशील और महत्वपूर्ण स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया गया था जिसके बाद इसे वर्ष 1993 में माॅन्ट्रेक्स रिकार्ड में भी शामिल किया गया।
रामसर कन्वेंशन:  
ईरान के रामसर नामक स्थान पर वर्ष 1971 में हुए कन्वेंशन आॅन वेटलैंड्स आॅफ इंटरनेशनल इंपाॅर्टेंस यानी अंतर्राष्ट्रीय महत्व के आर्द्रभूमि स्थलों के सम्मेलन-समझौते का लक्ष्य दुनिया भर के देशों के मध्य ऐसे प्राकृतिक स्थलों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए आम सहमति और व्यापक कार्ययोजना तैयार करना था। इस कन्वेंशन को वर्ष 1975 से लागू किया गया और भारत ने इसपर अपनी सहमति 1 फरवरी 1982 को दी है। भारत में रूद्रसागर त्रिपुरा, दीपोर बिल आसाम, ब्रजधाट से लेकर नरोरा के बीच गंगा नदी उत्तरप्रदेश, रेणुका झील हिमाचल प्रदेश, त्सो मरोरी जम्मूकश्मीर समेत कुल 26 आर्द्रभूमि स्थल रामसर कन्वेंशन में शामिल किए गए हैं। रामसर कन्वेंशन के तहत दुनिया के 2243 वेटलैंड्स यानी आर्द्रभूमियों को शामिल किया गया है जिसका कुल क्षेत्रफल 216,338,080 हेक्टेयर है।
यह कन्वेंशन नदियों से लेकर कोरल रीफ, दलदली इलाके, झीलों, क्षारीय आर्द्र भूमि, मैंग्रोव, कोरल रीफ समेत सभी प्राकृतिक व कृत्रिम जलसंरचनाओं, चाहे वे ताजे पानी के स्त्रोत हों या बंद झील हों, को हो रहे नुकसान से बचाने, उनका टिकाऊ उपयोग करने वाले पर्यावरणीय प्रबंधन प्रणालियों का विकास करते हुए संरक्षण को लक्षित है। इस दिशा में वांछित लक्ष्य को हासिल करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और तकनीकी हस्तांतरण की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

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